# यूँ   ही,  नतमस्तक     हो      जाऊंगा

  कैसे   करुँ   अर्पित   पुष्प     तुम्हें , जिनसे    उपवन   महक   रहा  हो ।   कैसे    नहलाओ    दूधों    से   तुम्हें, जहाँ  बचपन  घूट–घूट  को तरस रहा हो।   कैसे   बिठलाऊ   ऊंचे  भवनो  में  तुम्हें , जहाँ  बरसात  में  छपर  टपक   रहा हो।   कैसे    लगाऊ    छप्पन   भोग   तुम्हे, जहाँ   झूठन  पर जीवन गुजर रहा  हो।