न जाने क्यूँ तेरा इंतजार है आज भी

एक  शहर  में आ गये है हम । जरूर  कोई  बात  होगी ॥ वजह  नहीं,  कोई  मिलने की । बे  वजह  ही  मुलाकात होगी ॥   शिकवे शिकायतों के दौर, शुरू होने से पहले ख़त्म हो गये । अब  तो  गैरो की  तरह ही मुलाकात होगी ॥ न जाने क्यूँ तेरा इंतजार है आज भी

तुम देख न लो देखते हुए, इस बात से मन घबराता है

तुम  देख न लो  देखते हुए, इस बात से मन घबराता है । सामने जब तुम आते हो, न जाने   क्यूँ  ये सर झुक जाता है ॥   हो  न  जाओ तुम  रुसवा, अक्सर  ये  डर  सताता है । न  चाहते हुए भी  ,तेरा जिक्र दोस्तों में हो ही जाता है ॥   वे इंतहा 

जो अक्सर जीने के बजह बन जाते

बड़ी शिदत से सभाला है मुझे मेरे अपनों ने किसी ने साथ छोड़ कर, किसी ने मुख  मोड कर, पर वो कोन है    ? …….. जो दफ़ना कर अपने गमो को, मुस्करा के जी जाते है जहीर बन के मेरा हौसला  बढ़ाते है    ये  खुदा   बे नजीर है   तेरे  बंदे जो अक्सर जीने के बजह

सुबह थक कर, फिर शाम हुई है

सुबह  थक कर,  फिर   शाम  हुई है । रात कोरी आँखो में फिर , तमाम हुई है ॥   पथराई हुई आँखे, जैसे अब लग रही है । घबराया हुआ मन, सांसे  थम रही है ॥   उम्र ढल रही है, जिंदगी ठहर गई है  । सांसे  सिर्फ तेरी यादो पे, चल रही है ॥

ऐसे है हम हिंदुस्तानी

हाथो में हाथ, एक  दूजे का साथ, सतरंगी  जीवन, हर रिश्ते की अलग कहानी, ऐसे है हम हिंदुस्तानी,   थोड़े सी चाहत जरुर, खुशियाँ  भरपूर, हर रोज  त्यौहार, हर पल में जिंदगानी, ऐसे है हम हिंदुस्तानी,   छोटो  का सादर झुक  जाना , बड़ो का आशिर्बादी नजराना, नटखट  सा  बचपन, बाँकी  जवानी, ऐसे है हम

तुम बहुत याद आते

    मेरे स्वर में तुम, मेरे साज में तुम, मेरे गीतों में तुम, मेरी आवाज में तुम,   सुबह की लाली में तुम, दोपहर की धूप में तुम, तारो के छाँव  में तुम , रात की खामोशी में तुम,   गर्मी के तपन में तुम , ठंड़ की ठिठुरन में तुम, बरसात की फुहारों

आँखो की नमी का एहसास न है तुम्हे

  आँखो की नमी का एहसास न  है  तुम्हे । बेबफा होने का इल्जाम हम पर लगाते हो ॥   महसूस न कर सके तुम ,  जता न पाए हम । प्यार नहीं करते है, इल्जाम हम पर लगाते हो ॥   तोलते हो तराजू में रिश्तो को तुम । न निभाने का ,इल्जाम हम

खुशियों की कमी न थी, तेरे जहान में

खुशियों  की कमी न थी, तेरे जहान में। मै  बे वजह गम –ए– गर्द मे गुमराह रहा ॥   किस्मत हर रोज दस्तक देती दरवाजे पर । मै बंद दरवाज़ों में, नसीबो को कोसता रहा ॥   हर  रोज  पुकारा,  मेरे अपनों ने मुझे । मै बेगाना  समझ कर,  अनसुना करता रहा ॥   खुशियों 

गैर जरुरी तोफो से भर दी मेरी झोली

    गैर जरुरी तोफो से भर दी मेरी झोली मेरे कुछ फ़ाख़िर अपनों   ने  काश कोई उन्हे दरीबा–ऐ– तहजीब का पता देता ना यूँ में आज वे अदब होता  ना मेरा दामन खाली होता ना मेरा घर बिखरा होता                                          सुधीर कुमार

जिंदगी तो जी जाने दो

मिलना है खाक में , पर एक बार आसमान तो छू आने दो,   रहना है होश में, पर थोड़ा  मदहोश  तो  हो  जाने  दो   मुड़ कर देखोगे  तुम  जरूर, पर अपने  पीछे  तो  आने  दो,   रह जाऊगा सिर्फ यादो में, पर थोड़ी जिंदगी तो जी  जाने  दो                                      सुधीर कुमार