सुना है कि , रहमत से मुलाकात हो जाती है

  सांसो  को , आज भी  महका  जाती है I हवा, जो तेरे शहर से गुजर  के आती है II   अपने शहर में खोजता हूँ , अपना पता I जाती एक बस तेरे शहर को, फिर तेरी याद दिला जाती है II   भोर  से  पहले  तेरा,   छत  पर आ जाना I मेरी साइकिल

ज़िंदगी फिर मुस्कराई है

कहर   मे     जिंदगानी,    ज़िंदगी     फिर    मुस्कराई  है धूल  हूँ   इस  जमी  की,  जो     उन्होंने   माथे  से लगाई है बरसी    है     बरखा     मचल   के   इस  बंजर   जमी    पे रहमत है  तेरी   मौला ,या  वक्त ने  फिर बिसात  बिछाई है                                  

कल कल बहती अमृत  धारा

कल कल बहती अमृत  धारा , धरा     धन्य    हो     जाती है I है गंगे माँ ,जब तेरे  पावन चरणों को मेरी      माटी    छू   जाती    है I   सजते  है,   घट  तेरे  पग -पग  पर तीरथ  मेले , तेरे पावन  तट  पर गंगे  मईया ,  तेरे अचल की  छैया हर      दोष     मिटा    जाती    है I  

#मशक्कतों_ से  साहिल _पे आए  है#

मशक्कतों  से  साहिल  पे आए  है, दरकती   जमी  पे  पावं जमाए है, बुझ  जाते है  चिराग नरम हवाओं  में भी हमने  तो ,  तूफान मै दिये जलाये है I   आँखों के तारे,   अब   न्यारे  है, सहारे,          अब   किनारे    है, खफा है ,     वो   आज तो  क्या पर इस  जहान मे, वो  सबसे  प्यारे है

हिन्द के ये वीर सपूत

  स्वार्थ से परे, परमार्थ से भरे, जीवन जीवंत कर जाते है, है हिन्द के ये वीर सपूत जो I मातृभूमि को जीवन अर्पित कर जाते है II शान हो, अभिमान हो , शान हो तुम हिन्द की , अभिमान हो हिन्द का, अमन है तुम्हारे नाम से हम सत सत, नमन कर जाते है

ये बातें,

ये बातें ,कभी रुलाती है कभी हँसाती हैं I कभी, ना जाने क्या – क्या कह जाती हैं II ये बातें ,कभी जिंदगी दे जाती हैं I कभी , जीते जी मार जाती हैं II ये बातें ,कभी बड़ी आम होती हैं I कभी , बेहद खास हो जाती हैं II ये बातें ,कभी बेगानों

“एक माँ के लाल को ” – किरन परमार

आज मैंने सोते देखा, एक माँ के लाल को, धरती हरी-भरी कर रहा था, चिहुंकता तो कांपती धरती, रोता तो चिलचिला जाती। भूखा था कई दिनों का, साँसे धौंकनी के मानिंद चलती, जूठन के सहारे दिन गुजरता, ठहरता फिर चलता, जब हँसता तो धरती खिलखिला जाती। हाँथ में रईस का दो कौर, एक तरफ चिड़ियों

हे उपवन की पुलकित कलियाँ

हे उपवन की पुलकित कलियाँ तुम्हे प्रफ़ुल्लित हो जाना है मै उपवन का पीला पत्ता हो भारी, गिर जाना है नहीं चाहा मधु कण की नहीं सुगंध की आशा मिल जाऊ उपवन की मृद मे बस इतनी सी अभिलाषा छा जाना तुम, इस जग पर महकना इस उपवन को थाम के आँचल मस्त पवन का

मत देना उसका पता यारो, जहाँ पर वो रहा करता था

ऊचे दरख़्त है, सामने घर के  उसके I जहाँ अक्सर , वो  बैठा करता था II मत देना उसका पता यारो, जहाँ पर वो रहा करता  था   कर देंगे बयां , दर  उसके  घर  के I कि अक्सर वो, उनकी राह तकता रहता था II मत देना उसका पता यारो, जहाँ पर वो रहा

पापा !

पापा !  अब  तुम्हारे,   बिना  रह  लेता  हूँ I हर  जिम्मेदारी  को,  ख़ुशी  से सह लेता   हूँ II   पापा !  छोटा , अब पहले से  बड़ा  हो  गया  है। बन के मेरी लाठी , अब  साथ  खड़ा हो  गया   है II   पापा ! दीदी  की  राखी,  हर  साल आती  है। पर  वो  कभी-