सुनीरा का मौजी

 

 

 

सुनीरा के घर साँझ से जमघट लगा था। पच्चीस बरस बाद मौजी आया था।

 

सोमा  काकी  भड़की हुई थी।

 

क्यूँ  रे, अब क्या देखने आया है।

 

बिटिया व्याह के घर चली गई थी, बेटा सरकारी नौकर हो चुका था,

एक युग बीत चुका था।

 

तभी  मास्टर जी ने आवाज लगाई।

 

“काकी  ठीक  से  पहचानना, कहीं मौजी की जगह  बहरूपिया न हो”।

 

तू चुप कर मास्टर, कुछ भी बोल देता है, काकी तमतमाई हुई बोली।

 

“देख ले सुनीरा, जो ठीक समझे वो कर ” कहती हुई सोमा काकी  गलयारे  के तरफ चल दी ।

 

इससे पहले सुनीरा  कुछ  कह पाती, बेटा सख्त हो बोला।

 

अब हमें आपकी जरुरत नहीं है,    न तुमसे कोई रिश्ता है। मेरी  माँ ने  बहुत कष्ट उठाये है।

 

मौजी मौन था। सर झुखा हुआ था। सुबह का इंतज़ार था।

 

रात जा रही थी । सुबह को आना था। मौजी, साधुओ की टोली के साथ गावँ  छोड़ने  की तैयारी  मे था।

 

छप्पड के ओसारे में खड़ी  सुनीरा  कभी मौजी को देखती  कभी बेटे को। एक रात में पच्चीस बरस निकल रहे थे पर सुबह की उम्मीद थी।

 

आंखों की नमी को पल्लू से पोंछती छुपाती हुई उसने दरांती उठाई और अंधेरे में ही बड़बड़ाती हुई खेतों की तरफ चल दी।

 

“घर में एक कोने में पड़ा रहेगा, तो क्या घट जायेगा”।

 

सुधीर कुमार

26/05/2019

 

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