”वो फिर कभी नहीं मिलेंगी ”

                                         वो फिर कभी नहीं मिलेंगी

 

सामने वाले ऑटो के पीछे लिखा था। ऑटो तो आगे बढ़ गया मगर मैं पीछे चला आया। अमिताभ बच्चन सुपर स्टार थे  और आगरा के नन्द टॉकीज़ मे रियायती दर पर अमिताभ की फ़िल्म लगी थी।

 

बालूगंज का तिराहा पार करते ही चलते चलते अपनी हाफ पेन्ट  की  जेब  फिर एक बार टटोली। जेब में अंदर ही अंदर एक एक कर सारे सिक्के फिर गिने , पूरे दो  रुपये थे हिसाब थापौने दो रुपये की टिकट और इंटरवल में चव्वनी का समोसा।

 

सामने   नन्द  सिनेमा था।

 

बॉलकनी , फस्ट  और सेकण्ड  तीनो खिड़कियों पर महज चार पांच लोग ही थे।  मै सेकण्ड  क्लॉस  की लाइन में खड़ा हो गया

 

लाइन से तीन चार फीट दूर वो दीवार से सटी खड़ी थी। शांतहाथ फैलाये। मैं एक नज़र उसे देख, खिड़की पर जा पहुंचा।

 

कितने टिकट ?

 

अंकल जी, एक। यह कहते हुए मैंने पूरे  एक रुपया पिचहत्तर  पैसे  से बंद मुट्ठी खिड़की में बढ़ा दी और मुट्ठी खोल दी।

 

पचास पैसे और दो।

 

टिकट सवा दो रुपए का है कहते हुए पैसे वापस कर दिये।

 

मेरा महल ढेर हो गया।

 

पर वह अब भी अपनी दीवार से सटी खड़ी थी। शायद बहुत देर से देख रही थी। बिना कुछ बोले उसने अपना खाली हाथ आगे बड़ा दिया

 

अब, तुम्हे  कहा से दे दूं?

 

भारी सी, भरी सी आवाज़ में मैंने उससे कहा।

 

कितने पैसे कम  है?

 

क्यूँ ?

 

तुम्हारे पास जो  पैसे  है  मुझे दे   दो , मैं  टिकट  ला कर देती हूँ।

 

यकीन इतना नहीं था, जितनी की लालसा थी।

 

मेरी मुट्ठी ढीली हो गयी और मैंने दो रुपए उसकी ओर बढ़ा दिए।

 

वह गयी और आकर उसने मेरी हथेली पर  नीले  कागज  का टिकट रख दिया।

 

जाओ पिक्चर शुरू होने वाली है।

 

अंदर जाते जाते एक बार पीछे मुड़ कर उसे देखा। वह भी देख रही थी। पता नहीं क्यों लगा कि वो फिर कभी नहीं मिलेगी।

 

ऑटो आंखों से ओझल हो चुका था।

 

सुधीर कुमार

15-04-2019                                                                         

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