ज़िंदगी फिर मुस्कराई है

कहर   मे     जिंदगानी,    ज़िंदगी     फिर    मुस्कराई  है धूल  हूँ   इस  जमी  की,  जो     उन्होंने   माथे  से लगाई है बरसी    है     बरखा     मचल   के   इस  बंजर   जमी    पे रहमत है  तेरी   मौला ,या  वक्त ने  फिर बिसात  बिछाई है                                  

कल कल बहती अमृत  धारा

कल कल बहती अमृत  धारा , धरा     धन्य    हो     जाती है I है गंगे माँ ,जब तेरे  पावन चरणों को मेरी      माटी    छू   जाती    है I   सजते  है,   घट  तेरे  पग -पग  पर तीरथ  मेले , तेरे पावन  तट  पर गंगे  मईया ,  तेरे अचल की  छैया हर      दोष     मिटा    जाती    है I