“एक माँ के लाल को ” – किरन परमार

आज मैंने सोते देखा,
एक माँ के लाल को,
धरती हरी-भरी कर रहा था,
चिहुंकता तो कांपती धरती,
रोता तो चिलचिला जाती।

भूखा था कई दिनों का,
साँसे धौंकनी के मानिंद चलती,
जूठन के सहारे दिन गुजरता,
ठहरता फिर चलता,
जब हँसता तो धरती खिलखिला जाती।

हाँथ में रईस का दो कौर,
एक तरफ चिड़ियों का बौर,
खुद भी खाता, उन्हें भी खिलाता;
मैं देखती खड़ी मजबूर,
बस अपने शब्दों में गुनगुना जाती।

— किरन परमार
(रचना, से सम्बंधित सभी अधिकार लेखिका के है )

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *