हे उपवन की पुलकित कलियाँ

हे उपवन की पुलकित कलियाँ
तुम्हे प्रफ़ुल्लित हो जाना है
मै उपवन का पीला पत्ता
हो भारी, गिर जाना है

नहीं चाहा मधु कण की
नहीं सुगंध की आशा
मिल जाऊ उपवन की मृद मे
बस इतनी सी अभिलाषा

छा जाना तुम, इस जग पर
महकना इस उपवन को
थाम के आँचल मस्त पवन का
जी जाना इस जीवन को

गरजे मेघ, हो घनघोर अंधेरा
तनिक तुम न घबराना
हूँ साथ, तुम्हारे उपवन में
हो निर्भय ,आगे बढ़ते जाना

सुधीर कुमार

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