“एक माँ के लाल को ” – किरन परमार

आज मैंने सोते देखा, एक माँ के लाल को, धरती हरी-भरी कर रहा था, चिहुंकता तो कांपती धरती, रोता तो चिलचिला जाती। भूखा था कई दिनों का, साँसे धौंकनी के मानिंद चलती, जूठन के सहारे दिन गुजरता, ठहरता फिर चलता, जब हँसता तो धरती खिलखिला जाती। हाँथ में रईस का दो कौर, एक तरफ चिड़ियों

हे उपवन की पुलकित कलियाँ

हे उपवन की पुलकित कलियाँ तुम्हे प्रफ़ुल्लित हो जाना है मै उपवन का पीला पत्ता हो भारी, गिर जाना है नहीं चाहा मधु कण की नहीं सुगंध की आशा मिल जाऊ उपवन की मृद मे बस इतनी सी अभिलाषा छा जाना तुम, इस जग पर महकना इस उपवन को थाम के आँचल मस्त पवन का