विलख कर, दी थी आवाज़

विलख कर, दी थी आवाज़ I

तब नहीं था कोई, आस-पास ।।

चलना   सीखा ,  जब  अकेले I

तब  तुम भी हो साथ ।।

 

अश्क सूखे ,आँखो के I

तब कंधे मिले हज़ार ।।

जीना सीखा, इस दुनिया में I

तब हुआ तुम्हे हमसे प्यार ।।

 

बैरन भई निदिया I

थके नयन ,कर-कर इंतज़ार ।।

भोर हो गई , प्यारे तब तक  I

जब छाया  नींद का खुमार ।।

 

यह जीवन है प्यारे I

मत कर एक पल भी बेकार ।।

पकड़ राह , जीवन की वो

जिसमे मिली खुशियाँ हजार ।।

                                                               सुधीर कुमार

 

(श्री विनोद खन्ना जी की किताब के अंश से प्रेरित)

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *