शब्द बहुत कठोर थे

  शब्द बहुत कठोर थे वाक्य अति   घनघोर  थे अभिमान की पराकाष्ठा थी अपमान की व्यख्या   थी एक  मगरूर के लिये फटा     था     गुबार वह किये जा रही थी प्रहार   पर    प्रहार निशब्द    में गिर पड़ा हो    के        निढाल जीवन की आस न थी बस थोड़ी सी साँस थी खड़ा  मौन  मे, जीवन

ये जरूरी तो नहीं

एक  हसरत  हो  तुम  मेरी,     जागीर तो नहीं I बन  जाओ  मेरी  तकदीर,  ये जरुरी तो नहीं  ।।   दो  कदम  का  साथ ही काफी है,  राह  दिखाने  के लिये I बन  जाओ  मेरे   हमराह ,     ये  जरुरी  तो  नहीं  ।।   ख्वाहिशे  लाख  बसाई  है ,  मैने  दिल में जरूर I हो जाये सभी

विलख कर, दी थी आवाज़

विलख कर, दी थी आवाज़ I तब नहीं था कोई, आस-पास ।। चलना   सीखा ,  जब  अकेले I तब  तुम भी हो साथ ।।   अश्क सूखे ,आँखो के I तब कंधे मिले हज़ार ।। जीना सीखा, इस दुनिया में I तब हुआ तुम्हे हमसे प्यार ।।   बैरन भई निदिया I थके नयन ,कर-कर

#फिर_ एक बार_ जिंदगी जी जाऊ#

  फिर रंगो  की कूची उठाऊ I फिर जिंदगी तेरी सुनहरी तस्वीर बनाऊ ।। फिर बनू  जरुरत  किसी की  I फिर किसी के मुस्कराने की बजह बन जाऊ ।।                                फिर एक बार जिंदगी जी जाऊ   फिर कोई पुकारे देके आवाज़ मुझे I फिर

रख हौसला ,मंज़िल पा ही जायेगा

मत हो अधीर, राही अंधेरा फिर छठ जायेगा   पतझड़ है चंद दिनों का, राही बसंत फिर आयेगा   चल जीवन की राह पर राही, बिछड़ा हमराह मिल ही जायेगा तप के विरह की अग्नि में, राही प्रेम और  कुंदन हो  जायेगा   सुगम नहीं है   पथ जीवन का  राही रख हौसला ,मंज़िल पा ही

बहुत याद आता है बचपन सुहाना

वो  पैदल नंगे  पैर स्कूल जाना. वो केथ तोडना, इमली बीन के लाना. वो ताल  तलइयो में नहाना. वो झर वेरी से वेर तोड़ना. वो बाग से अमरुद चुराना.               बहुत याद आता है बचपन सुहाना वो पापा का घर  गांव आना वो घी की खली बनी में मिठाई भर के लाना वो गावं  मे

हम ने, आशियाना कहाँ बनाया है

  सज्दे में जब भी सर झुकाया है । खुदा से पहले  तू याद आया है ॥   एक पल न जाते, वो मेरी यादो से । पर खुदा तेरा ख्याल, कभी-कभी आया है ॥   माना खुदा , जिंदगी तेरी रहमत है । पर जीना मुझे, मेरे महबूब ने सिखाया है   गुजरती है

थम जा जिंदगी जरा , जिंदगानी अभी बाकी है

  थम  जा  जिंदगी जरा , जिंदगानी अभी बाकी है  । तेरे मेरे  किस्से  और  कहानी,  अभी  बाकी है  ॥   जिंदगी के सफर में, तू छूटा मेरे हमसफ़र तो क्या  । फिर  एक  रहा  पर   साथ  चलना , अभी बाकी है  ॥   इत्तफाकन   फासले   है,  दर्मिया   तो   क्या  । तेरे  मेरे  मिलन   की

न जाने क्यूँ तेरा इंतजार है आज भी

एक  शहर  में आ गये है हम । जरूर  कोई  बात  होगी ॥ वजह  नहीं,  कोई  मिलने की । बे  वजह  ही  मुलाकात होगी ॥   शिकवे शिकायतों के दौर, शुरू होने से पहले ख़त्म हो गये । अब  तो  गैरो की  तरह ही मुलाकात होगी ॥ न जाने क्यूँ तेरा इंतजार है आज भी

तुम देख न लो देखते हुए, इस बात से मन घबराता है

तुम  देख न लो  देखते हुए, इस बात से मन घबराता है । सामने जब तुम आते हो, न जाने   क्यूँ  ये सर झुक जाता है ॥   हो  न  जाओ तुम  रुसवा, अक्सर  ये  डर  सताता है । न  चाहते हुए भी  ,तेरा जिक्र दोस्तों में हो ही जाता है ॥   वे इंतहा